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पैगम्बर मोहम्मद के साथ संपन्न मुख्यतः सभी चमत्कार उनके आत्मतत्व तक ही सीमित थे और ये उस पीढ़ी के अनुयायियों तक ही सीमित रहे। क़ुरआन का चमत्कार पुनर्जन्म के समय तक ही रहा। ये चमत्कार प्राकृतिक अवस्था के उच्च स्तर व रहस्यात्मक कल्पनाओं को अभिव्यक्ति देने से संबंधित है। ऐसा कोई भी काल नही होगा जहाँ उसके संदेश उपस्थित नही होंगे। यह नियमित रुप से अपनी उपस्थिती की सार्थकता को सिद्घ करता रहेगा। अन्य शब्दों में, भौतिक क़ुरआन की उपस्थिति, क़ुरआन की वास्तविकता का सत्याभास मात्र है। [1]
क़ुरआन एक ब्रम्हांड के समान है जिसमें अनेक उड़न खतोलों के समान अस्तित्व व समझ के स्तर है... ये जान लेना महत्वपूर्ण है कि हम आत्मतत्व को आत्मसात कर ईश्वरीय कृपा के बगैर क़ुरआन के सही अर्थ को नही जान सकते। यदि हम क़ुरआन को सतही तौर पर देखें और इसके विचारों का उथला सा आकलन करें, हम सतह पर तैरते अस्तित्व के भावों को देखें और आंतरिक अस्तित्व से अछूते रहकर व्यवहार करेंगे तो क़ुरआन का अर्थ भी हमें मात्र सतही तौर पर समझ में आएगा। वह अपने रहस्यों को हमसे छुपा रखेगी और हम सत्य का साक्षात्कार नही कर पाएँगे। यह मात्र आध्यात्मिक जागृति से ही संभव है कि मानव पवित्र शब्दों के रहस्यात्मक अर्थ को समझ सके।
ज़लाल-अल-दीन रुमी जलालुद्दीन रुमी, फारसी रहस्यबोध के कवि, क़ुरआन व विश्वासक के संबंध को इस प्रकार से अभिव्यक्त करते है : ''कुछ व्यक्ति नवजात शिशुओं के समान शािब्दक अर्थ आत्मसात कर क़ुरआन को दुग्धपान के समान ग्रहण करते है। परंतु वे, जो अनुभवी है व ऊँची व परिपक्व सोच रखते है, वे ही सही समझदारी के साथ क़ुरआन के आंतरिक मर्म को समझते है।"
क़ुरआन के विद्यार्थी को आंतरिक व बाह्य, रहस्यात्मक व विश्लेष्णात्मक शिक्षण के प्रकारों के मध्य अंतर करना होता है।
रुमी द्वारा मसनवी के अंतर्गत, क़ुरआन के रहस्यों को इस प्रकार से अभिव्यक्त किया गया :
'क़ुरआन के शब्दों को जानना सरल है,
परंतु बाह्य स्वरुप में एक आंतरिक रहस्य है।
उस रहस्यमय अर्थ में ही तृतीय रुप में
उच्च विज्ञता शामिल है।
चौथा अर्थ किसी ने भी नही देखा।
रक्षा प्रभु! अतुलनीय, सर्वप्रदाता।
और वे आगे बढ़े, एक एक कर सात अर्थों तक
पैगम्बर के शब्दों के अनुसार, बिना किसी शक शुबहे के
मेरे पुत्र! मात्र ऊपरी अर्थ पर ही सीमित न रहो
यहाँ तक कि आदम के साथ के शैतान भी ऊपरी ही थे
ऊपरी अर्थ यानी शैतान का शरीर :
जिसका शरीर दृष्टिगत होता है परंतु आत्मा अदृश्य है।
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1. Kenneth Cragg and R. Marston Speight, Islam from Within: anthology of a Religion, Wadsworth Publishing Company, 1980, p.18
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