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शुद्घता व नैतिकता के पथ का प्रारंभिक बिंदु है ''नफ्स" से परे जाना अर्थात हमारे निचले मूल्यों से ऊपर उठना, इस विश्व के व्यक्तिगत प्रतिनिधित्व व उसके प्रलोभनों से ऊपर उठना।
'नफ्स" की तुलना स्त्री तत्व से भी की जाती है जो स्वयं की तरकीबों से साधक के मन को डाँवाडोल करते हुए उसे सांसारिकता के प्रलोभनों की ओर खींचती है। यह तथ्य कि अरबी भाषा में ''नफ्स" स्त्री तत्व को परिभाषित करता है, यह इस तुलना को सरल व सटीक कर देता है। [1] अरबी भाषा में संज्ञाएँ स्त्रीलिंग व पुर्लिंग दोनो होती है। ''सूर्य'' यह शब्द स्त्रीलिंग का है व ''चन्द्रमा" पुर्लिंग का।
बहरहाल स्त्री व पुरुष दोनों को ही क़ुरआन द्वारा ''नफ्स" के अनुशासन हेतु मार्गदर्शन दिया जाता है। इस संबंध में जामी द्वारा, स्त्री संत राबिया के लिये कही गई कविता आज भी प्रासंगिक है :
यदि सारी स्त्रियाँ वैसी हो जैसा बताया गया
फिर स्त्रियाँ पुरुषों से ज्यादा सही है।
चूँकि स्त्रीलिंग सूर्य हेतु भी लज्जा का विषय नही
न ही पुर्लिंग होना चन्द्रमा का मान बढ़ाता है। 2 [2]
एनमेरी शिमेल, अपनी पुस्तक ''इस्लाम के रहस्यमय कोण" में लिखती है कि समस्त पूर्वाग्रहों के साथ, मुस्लिम बमुश्किल उस घृणा तत्व तक पहुँचते है जो मध्यकालीन ईसाई लेखकों द्वारा स्त्रीतत्व को अस्वीकार करने को लेकर अपनाया गया था। हव्वा को आदम के पतन का कारण नही माना गया और इस्लाम पर ये आरोप मढ़ते रहे कि इस्लाम के अनुसार ''स्त्रियों में आत्मा नही होती" जो कि क़ुरआन के शास्त्रीय पक्ष में कहीं भी शामिल नही है।3 [3]
हमें यह बताया गया है ईश्वर ने स्त्री व पुरुष को एक ही ईकाई से उत्पन्न किया है (4:1)। हे मानवमात्र ! हमने तुम्हे एक ही ईकाई से उत्पन्न किया है एक जोड़ी (स्त्री व पुरुष) के रुप में व तुम्हे अलग अलग देशों व प्रकारों में उत्पन्न किया है जिससे तुम एक दूसरे को तरीके से जान सको न कि एक दूसरे से घृणा करो। ये तुम्हारा सम्मान है कि तुममें अल्लाह की वह किरण मौजूद है जो सच्ची नैतिकता का स्वरुप है। और अल्लाह के पास संपूर्ण ज्ञान है और वह सर्वज्ञाता है। (49:13) हम सभी, स्त्री व पुरुष, एक ही स्रोत से उत्पन्न हुए है और यही सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
يأيها الناس إنا خلقناكم من ذكر و أنثى و جعلناكم شعوبا و قبائل لتعارفوا إن أكرمكم عند الله أتقاكم إن الله عليم خبير.
आध्यात्मिक रुप से इस बात का कोई फर्क नही पड़ता कि हम स्त्री है अथवा पुरुष। धार्मिक साम्राज्य, कोशिकीय व भौतिक कोणों से परे है। सांस्कृतिक, सामाजिक व आर्थिक मुद्दों में ये बात नहीं उठनी चाहिये कि स्त्री क्या करे और क्या न करे और यह पूर्णतः नियंत्रण में हो।
हज़रत नादर अंघा, पीर ओव्येसी कहते है : 'गुलाब की सुगंध का कोई लिंग नही होता।"
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1. Annmarie Schimmel, Mystical Dimensions of Islam, University of North Carolina Press, Chapel Hill, 1975, p, 112-113
2. Abdurrahman Jami, Nafahat al-uns, Edited by M. Tauhidipur. Tehran, 1957., Teheran, 1957
3. Annmarie Schimmel, Mystical Dimensions of Islam, University of North Carolina Press, Chapel Hill, 1975, p. 128-129
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